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राजनीति

बावनी इमली हत्याकांड: एक पेड़, 52 शहीद

✍ G.P. Singh Advocate 📅 10 अक्टूबर 2026 👁 21 बार पढ़ा गया
बावनी इमली हत्याकांड: एक पेड़, 52 शहीद

आपकी जानकारी मे अभी तक यही पहुंचाया जाता रहा की आजादी कांग्रेस ने चाचा नेहरू ने दिलाई जब सच है की कांग्रेस पार्टी का एक भी सदस्य फांसी नही बावजूद इसके देश को आजादी कांग्रेस ने ही दिलाई आज आपको आजादी की खातिर जा गवाने वाले देश के 52 शहीदों की शहीदी घटना को आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ जैसे 52 आज़ादी के दीवानों की गिरफ्तारी घोरहा गांव फतेहपुर बिंदकी के पास हुई थी,  सभी को फांसी 28 अप्रैल 1958 को दी गयी एवं 52 शवों को 3–4 जून 1858 की रात उतारा गया और शिवराजपुर घाट पर अंतिम संस्कार हुआ, तथा पेड़ क

फतेहपुर की “52 इमली” की कहानी वास्तव में बावनी इमली हत्याकांड के नाम से जानी जाती है। यहाँ 52 पेड़ नहीं थे; बल्कि एक ही विशाल इमली के पेड़ पर 52 क्रांतिकारियों को एक साथ फांसी दी गई थी। “बावनी” का अर्थ 52 है, इसलिए इस पेड़ को बावनी इमली कहा जाने लगा।

क्या हुआ था?

1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान फतेहपुर जिले के रसूलपुर गांव के जमींदार ठाकुर जोधा सिंह अटैया ने अपने 51 साथियों के साथ अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष छेड़ा। उन्होंने किसानों को संगठित कर गुरिल्ला युद्ध किया, फतेहपुर के कोषागार और कचहरी पर कब्जा किया, तथा अंग्रेज अधिकारी कर्नल पावेल को युद्ध में हराया। अंग्रेजों ने बदला लेने की योजना बनाई। मुखबिर की सूचना पर 28 अप्रैल 1858 को कर्नल क्रिस्टाइल की घुड़सवार सेना ने घोरहा गांव के पास जोधा सिंह अटैया और उनके 51 साथियों को धोखे से गिरफ्तार कर लिया।

फांसी का दिन

उसी दिन, 28 अप्रैल 1858 को, सभी 52 क्रांतिकारियों को फतेहपुर जिले की बिंदकी तहसील के खजुहा के पास, मुगल रोड पर स्थित एक बड़े इमली के पेड़ पर एक साथ फांसी दे दी गई। यह भारतीय इतिहास की अत्यंत दुर्लभ और क्रूर घटना मानी जाती है, जिसमें एक ही पेड़ पर एक साथ 52 स्वतंत्रता सेनानियों को फांसी दी गई।

अंग्रेजों की बर्बरता यहीं नहीं रुकी। लोगों में आतंक फैलाने के लिए उन्होंने शवों को पेड़ से उतारने पर रोक लगा दी और चेतावनी दी कि ऐसा करने वाले को भी वही दंड मिलेगा। कहा जाता है कि शव लगभग 37 दिनों तक पेड़ पर लटके रहे।

शवों का अंतिम संस्कार

3 जून 1858 की रात स्थानीय नेता ठाकुर महाराज सिंह / भवानी सिंह ने अपने साथियों के साथ अंग्रेजी आदेश की अवहेलना की और शवों को पेड़ से उतारा। अगले दिन, 4 जून 1858 को, गंगा किनारे स्थित शिवराजपुर घाट पर इन शहीदों का अंतिम संस्कार किया गया।

आज वहाँ क्या है?

वह ऐतिहासिक इमली का पेड़ आज भी बिंदकी–खजुहा के बीच मुगल रोड पर स्थित है और इसे शहीद स्मारक का दर्जा प्राप्त है।
पेड़ के नीचे 52 छोटे स्तंभ बनाए गए हैं, जो उन 52 शहीदों की स्मृति में स्थापित हैं।
उत्तर प्रदेश सरकार ने 2021 में इस पेड़ को विरासत वृक्ष घोषित किया; इसकी आयु लगभग 350 से 400 वर्ष आंकी गई है।
यह स्थल पर्यटक स्थल भी है और यहाँ स्वतंत्रता दिवस तथा गणतंत्र दिवस पर श्रद्धांजलि सभाएँ आयोजित होती हैं।
28 अप्रैल को यहाँ शहीदों की स्मृति में शहीदी दिवस मनाया जाता है।

अतिरिक्त जानकारी

इस घटना को कई लोग “दूसरा जलियांवाला बाग” भी कहते हैं, क्योंकि इसमें एक ही दिन बड़ी संख्या में निर्दोष/क्रांतिकारी भारतीयों की हत्या की गई थी।
जोधा सिंह अटैया के प्रमुख साथियों में ठाकुर दरियाव सिंह, शिवदयाल सिंह और महाराज सिंह के नाम उल्लेखनीय हैं।
फतेहपुर के तत्कालीन डिप्टी कलेक्टर हिकमत उल्ला खान भी क्रांतिकारियों के समर्थन में थे; बाद में अंग्रेजों ने उन्हें बंदी बनाकर फांसी दी।
स्थानीय मान्यता है कि हत्याकांड के बाद मूल इमली का पेड़ आगे नहीं बढ़ा; बाद में उसी स्थान पर नया पौधा लगाया गया।
फतेहपुर के लोग आज भी कहते हैं—
“जहाँ हर इमली एक बलिदान की गवाही देती है।”
बावनी इमली केवल एक पेड़ नहीं, बल्कि भारत की आजादी के लिए दी गई 52 अमर कुर्बानियों का जीवंत प्रतीक है।                      ठाकुर जोधा सिंह अटैया 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के फतेहपुर क्षेत्र के प्रमुख क्रांतिकारी नेता थे। वे अंग्रेजों के खिलाफ गुरिल्ला युद्ध करने, फतेहपुर के कोषागार और कचहरी पर कब्जा करने तथा बावनी इमली हत्याकांड में शहीद होने के लिए जाने जाते हैं।

जन्म और परिचय

ठाकुर जोधा सिंह अटैया का जन्म उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जिले के बिंदकी क्षेत्र के अटैया रसूलपुर गांव (वर्तमान पधारा) में हुआ था। वे राजपूत परिवार से थे और उनके पिता ठाकुर भवानी सिंह उस समय के प्रभावशाली जमींदार थे। जमींदार होने के कारण उनका क्षेत्रीय प्रभाव था, जिसका उपयोग उन्होंने अंग्रेजी शासन के विरुद्ध किसानों और स्थानीय योद्धाओं को संगठित करने में किया। कुछ स्रोतों के अनुसार उनका जन्म लगभग 1820 के आसपास हुआ था।

1857 का संघर्ष

1857 की क्रांति फैलते ही जोधा सिंह ने ठाकुर दरियाव सिंह और ठाकुर शिवदयाल सिंह के साथ अंग्रेजों के विरुद्ध छापामार युद्ध शुरू किया। उनका दल बिंदकी, खजुहा और आसपास के इलाकों में किसानों को एकजुट कर अंग्रेजी प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती बन गया।
10 जून 1857 को उनके नेतृत्व में क्रांतिकारियों ने फतेहपुर की कचहरी और सरकारी कोषागार पर कब्जा कर लिया। इस कार्य में तत्कालीन डिप्टी कलेक्टर हिकमत उल्ला खान भी उनके सहयोगी थे।

प्रमुख कारनामे

27 अक्टूबर 1857: महमूदपुर गांव में उनके दल ने एक अंग्रेज दारोगा और अंग्रेज सिपाही को घेरकर मार डाला।
7 दिसंबर 1857: रानीपुर पुलिस चौकी पर हमला किया और अंग्रेजों के घोड़े छीन लिए।
9 दिसंबर 1857: जहानाबाद तहसील में छापा मारकर तहसीलदार को बंदी बनाया और सरकारी खजाने पर कब्जा किया।
कर्नल पावेल की मृत्यु: उनके दल ने अंग्रेज अधिकारी कर्नल पावेल को युद्ध में हराकर मार डाला, जिससे अंग्रेजी प्रशासन बहुत चौकन्ना हो गया।
इन कारनामों से आहत होकर अंग्रेजों ने जोधा सिंह को “डकैत” घोषित कर दिया, लेकिन स्थानीय लोग उन्हें आजादी का योद्धा मानते थे।

गिरफ्तारी और शहादत

28 अप्रैल 1858 को जोधा सिंह अपने 51 साथियों के साथ खजुहा लौट रहे थे। एक मुखबिर की सूचना पर कर्नल क्रिस्टाइल की घुड़सवार सेना ने उन सभी को घोरहा गांव के पास धोखे से गिरफ्तार कर लिया।
उसी दिन उन सभी 52 क्रांतिकारियों को खजुहा के पास मुगल रोड पर स्थित विशाल इमली के पेड़ पर एक साथ फांसी दे दी गई। इसी घटना के बाद उस पेड़ का नाम बावनी इमली पड़ा, क्योंकि “बावनी” का अर्थ 52 है।
अंग्रेजों ने डर फैलाने के लिए शवों को पेड़ से उतारने पर रोक लगा दी। लगभग 37 दिनों तक शव पेड़ पर लटके रहे; अंत में 3–4 जून 1858 की रात ठाकुर महाराज सिंह ने अपने साथियों के साथ शव उतारे और शिवराजपुर घाट पर अंतिम संस्कार किया।

विरासत

ठाकुर जोधा सिंह अटैया को मध्य उत्तर प्रदेश के प्रारंभिक स्वतंत्रता सेनानियों में गिना जाता है। बावनी इमली स्थल पर उनकी और उनके साथियों की स्मृति में स्मारक बने हैं, जहाँ शहीदी दिवस तथा राष्ट्रीय पर्वों पर श्रद्धांजलि दी जाती है। उनके सम्मान में फतेहपुर के मेडिकल कॉलेज का नाम अमर शहीद जोधा सिंह अटैया ठाकुर दरियाव सिंह मेडिकल कॉलेज रखा गया है।
ठाकुर जोधा सिंह अटैया वे अनगिनत वीरों में से एक हैं, जिन्होंने देश की आजादी के लिए अपना सर्वस्व अर्पित कर दिया, पर इतिहास की मुख्यधारा में उनका नाम आज भी पूरी तरह उभरा नहीं है। बावनी इमली हत्याकांड में ठाकुर जोधा सिंह अटैया के साथ 51 अन्य क्रांतिकारी शहीद हुए थे। पूरी सूची ऐतिहासिक रूप से अपूर्ण रही है, लेकिन स्मारक पर अंकित नामों और स्थानीय इतिहास में कुछ प्रमुख नाम उपलब्ध हैं।
प्रमुख नेता
स्मारक पर अंकित अन्य नाम
बावनी इमली स्मारक पर 52 शहीदों के नाम तीन पत्थरों पर अंकित हैं। उपलब्ध आंशिक सूची में निम्न नाम शामिल हैं:
बिंदा सिंह
बंसीधर
विद्यासागर
बच्चालाल
बलदेव प्रसाद
बद्री प्रसाद
भगवान दीन
मदन मोहन
छोटे लाल
चैता
दुर्गा
गिरधारी लाल
गया दीन
गुलजारी
गजोधर प्रसाद
हरि प्रसाद
जगन्नाथ
जयराम सिंह
कल्लू सिंह
कढ़ाई लाल
केदारनाथ सिंह
लच्छूआ
मन्नू लाल
मनबोधन
मुकुंद
मथुरा
गजानंद
पराग नारायण
पन्ना लाल
प्रभु दयाल
फूलमती
रामदत्त
रघुनंदन
रामदास
राजाराम
शिवनायक सिंह
शिव नारायण
सोहन लाल
शंकर
शिवदत्त
शिवशंकर
सिद्धगोपाल
सुरजदीन
यदुनंदन प्रसाद
रघुनंदन सिंह
जोधा सिंह अटैया

महत्वपूर्ण बात

इतिहासकारों और स्थानीय अभिलेखों में सभी 52 शहीदों के नाम, गांव और परिवार की पूरी पहचान एक समान रूप से दर्ज नहीं है। इसलिए कई स्थानीय स्रोतों में नामों की वर्तनी, क्रम या पहचान में अंतर मिलता है; इसलिए इन्हें स्मारक पर अंकित नामों और जिला गजेटियर जैसे आधिकारिक स्रोतों के आधार पर ही पुष्ट करना उचित रहता है। बावनी इमली आज फतेहपुर जिले का एक मान्यता प्राप्त शहीद स्मारक और पर्यटक स्थल है। वह ऐतिहासिक इमली का पेड़ आज भी मौजूद है, और यहाँ 52 शहीदों की स्मृति में स्मारक तथा स्तंभ बने हैं।

स्थान और स्मारक

यह स्थल फतेहपुर जिले की बिंदकी तहसील में, बिंदकी से लगभग 3 किलोमीटर पश्चिम, मुगल रोड पर खजुहा के निकट स्थित है। जिला प्रशासन इसे आधिकारिक पर्यटक स्थल के रूप में सूचीबद्ध करता है।
यहाँ वह पुराना इमली का पेड़ है, जिस पर 28 अप्रैल 1858 को 52 क्रांतिकारियों को फांसी दी गई थी। शहीदों की स्मृति में यहाँ स्मारक और स्तंभ बनाए गए हैं; जिला प्रशासन की गैलरी में भी “बावनी इमली स्मारक” और “बावनी इमली स्तंभ” दर्ज हैं।

वर्तमान स्थिति

पेड़ आज भी मौजूद है, लेकिन स्थानीय मान्यता है कि हत्याकांड के बाद इसका विकास रुक गया।
यह स्थल शहीद स्मारक के रूप में संरक्षित और पहचाना जाता है।
शहीदों के नाम स्मारक पत्थरों पर अंकित हैं, जिनमें जोधा सिंह अटैया सहित अन्य क्रांतिकारियों के नाम शामिल हैं।
स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस और 28 अप्रैल के शहीदी दिवस पर यहाँ श्रद्धांजलि सभाएँ आयोजित होती हैं।
2021 में इस पेड़ को उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा विरासत वृक्ष घोषित किया गया था।
पहुँचने का मार्ग

चुनौतियाँ और मांग

स्थानीय लोग और इतिहास प्रेमी इस स्थल को जलियांवाला बाग जैसी राष्ट्रीय पहचान दिलाने की मांग करते रहे हैं। स्मारक बना है, पर इसे राष्ट्रीय स्तर पर उचित प्रचार, रखरखाव और ऐतिहासिक संरक्षण की कमी का सामना करना पड़ता है।ठाकुर जोधा सिंह अटैया के जन्मस्थान रसूलपुर/अटैया क्षेत्र को भी उतनी विकास योजनाओं और संरक्षण की सुविधा नहीं मिल पाई है, जितनी इस ऐतिहासिक घटना के महत्व के अनुरूप होनी चाहिए।

ऐतिहासिक महत्व

बावनी इमली आज केवल एक पेड़ नहीं, बल्कि 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के उन अनगिनत गुमनाम वीरों का जीवंत प्रतीक है, जिन्होंने अंग्रेजी शासन के विरुद्ध अपनी जान दी। यह स्थल आने वाली पीढ़ियों को बलिदान, साहस और स्वतंत्रता की कीमत सिखाता है।
 
 
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