15 अक्टूबर 2026, गुरुवार
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योगी आदित्यनाथ का 2027 के विधानसभा चुनावों से पहले बड़ी राजनीतिक घेराबंदी का आक्रामक प्रयास, अखिलेश यादव की छवि और पार्टी को धक्का I

✍ Mamta Singh 📅 15 अक्टूबर 2026 👁 24 बार पढ़ा गया
योगी आदित्यनाथ का 2027 के विधानसभा चुनावों से पहले बड़ी राजनीतिक घेराबंदी का आक्रामक प्रयास, अखिलेश यादव की छवि और पार्टी को धक्का I

उत्तर प्रदेश में वर्ष 2014 के पशुधन प्रसार अधिकारी भर्ती घोटाले में आर्थिक अपराध शाखा (EOW) ने 14 अक्टूबर 2026 को बड़ी कार्रवाई करते हुए 1980 बैच के रिटायर्ड आईएएस (IAS) अधिकारी और तत्कालीन प्रमुख सचिव योगेश कुमार को गिरफ्तार कर लिया है। EOW की टीम ने उन्हें लखनऊ के गोमती नगर स्थित उनके आवास से हिरासत में लिया। यह कार्रवाई ओएमआर (OMR) शीट के मूल्यांकन, मेरिट सूची बनाने में धांधली और चयन प्रक्रिया में नियमों की अनदेखी के गंभीर आरोपों के तहत की गई है।

भर्ती का मुख्य विवरण और घोटाला

वर्ष 2014 में तत्कालीन समाजवादी पार्टी की सरकार के दौरान प्रदेश के 17 मंडलों में पशुधन प्रसार अधिकारियों के कुल 1,198 पदों पर भर्ती निकाली गई थी। इसकी लिखित परीक्षा 2 फरवरी 2014 को आयोजित की गई थी। लिखित परीक्षा के लिए 80 अंक और इंटरव्यू के लिए 20 अंक तय थे। परीक्षा के बाद 1,005 अभ्यर्थियों का चयन हुआ, जिन्हें ट्रेनिंग के बाद नियुक्तियां (जॉइनिंग) भी दे दी गईं। भर्ती प्रक्रिया पूरी होने के तत्काल बाद, 30 जून 2014 को योगेश कुमार सेवानिवृत्त (रिटायर) हो गए थे। आरोप है कि ओएमआर शीट के मूल्यांकन और फाइनल मेरिट सूची की फाइल पर तत्कालीन प्रमुख सचिव के तौर पर उन्होंने हस्ताक्षर किए थे। पशुधन प्रसार अधिकारी भर्ती घोटाले में ओएमआर (OMR) शीट में की गई हेरफेर के तरीके और इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस ऐतिहासिक आदेश के मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं, जिसने इस पूरे मामले की जांच की दिशा बदल दी:

ओएमआर शीट में हेरफेर का तरीका (Modus Operandi)

EOW और SIT की जांच में सामने आया कि इस घोटाले को अंजाम देने के लिए एक सोची-समझी और तकनीकी रूप से शातिर कार्यप्रणाली अपनाई गई थी:

केंद्रीकृत मूल्यांकन और ओएमआर की जब्ती : नियमावली के अनुसार, इस भर्ती की परीक्षा और कॉपियों का मूल्यांकन मंडल स्तर पर अलग-अलग होना चाहिए था। लेकिन नियमों को ताक पर रखकर तत्कालीन प्रमुख सचिव योगेश कुमार और मंत्री राजकिशोर सिंह ने सभी ओएमआर शीट को एक ही जगह (मुख्यालय स्तर पर) मंगाकर जांचने का अवैध निर्णय लिया।

निजी एजेंसियों के साथ साठगांठ: परीक्षा का डेटा और कॉपियां मेसर्स वी.वी. इंटरप्राइजेज और मेसर्स डेटा सॉफ्ट जैसी चुनिंदा निजी एजेंसियों को सौंपी गईं। इन एजेंसियों के संचालकों ने विभागीय अधिकारियों के साथ मिलकर खेल रचा।

अंकपत्रों और कॉपियों में हेरफेर: जांच एजेंसियों के अनुसार, लिखित परीक्षा के बाद अपात्र और चहेते अभ्यर्थियों को पास कराने के लिए उनकी मूल उत्तर पुस्तिकाओं (OMR Sheets) और अंकपत्रों में मैन्युअल रूप से छेड़छाड़ की गई। चहेते उम्मीदवारों के प्राप्तांकों को कंप्यूटर डेटाबेस में बढ़ा दिया गया ताकि वे मेरिट सूची में शीर्ष पर आ सकें।

फर्जी दस्तावेजों का सृजन: जिन अपात्र अभ्यर्थियों ने रिश्वत दी थी, उन्हें योग्य दिखाने के लिए परीक्षा के परिणामों में व्यापक कूटकरण (Forgery) किया गया और फर्जी चयन सूचियां तैयार कर फाइल को प्रमुख सचिव से अनुमोदित कराया गया।

मामले में गड़बड़ी और हाईकोर्ट का हस्तक्षेप

भर्ती परिणाम जारी होने के बाद चयन प्रक्रिया में बड़े पैमाने पर अनियमितताओं, नियमों के उल्लंघन और अपात्र लोगों को लाभ पहुंचाने के आरोप लगे। भर्ती में असफल रहे 34 अभ्यर्थियों ने इलाहाबाद हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया और याचिकाएं दायर कीं। याचिकाओं पर सुनवाई के बाद, हाईकोर्ट के आदेश पर 17 दिसंबर 2017 को इस घोटाले की जांच विशेष जांच दल (SIT) को सौंप दी गई।

SIT से EOW तक की जांच रिपोर्ट

SIT ने साल 2018 में अपनी जांच पूरी कर रिपोर्ट शासन को सौंपी, जिसमें कई अधिकारियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई की सिफारिश की गई थी। जांच के आधार पर वर्ष 2019 में एसआईटी थाने में मुकदमा संख्या 01/2019 दर्ज किया गया। यह एफआईआर भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 409, 420, 467, 468, 471, 120बी, 201 और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 13(1)(डी) के तहत दर्ज हुई थी।

निलंबन और कार्रवाई : साल 2019 में तत्कालीन निदेशक रहे चरण सिंह यादव को निलंबित किया गया और 29 जुलाई 2021 को 28 लोगों के खिलाफ नामजद एफआईआर दर्ज की गई। इस मामले की आगे की जांच आर्थिक अपराध शाखा (EOW) कर रही है, जिसने अब तक कुल 28 अभियुक्तों में से 25 के खिलाफ कोर्ट में चार्जशीट दाखिल कर दी है।

अन्य रसूखदारों पर शिकंजा

इस घोटाले में परीक्षा कराने वाली प्राइवेट संस्थाओं के साथ-साथ तत्कालीन पशुधन विकास मंत्री राजकिशोर सिंह की भूमिका भी जांच के दायरे में है। मंत्री के खिलाफ केस चलाने (अभियोजन स्वीकृति) से जुड़ी फाइल फिलहाल शासन स्तर पर लंबित है। वर्तमान में, जिन 1005 अभ्यर्थियों को उस वक्त जॉइनिंग दी गई थी, वे अब भी अपनी नौकरी पर बने हुए हैं क्योंकि भर्ती को पूरी तरह से निरस्त नहीं किया गया है।

मामले में नामजद अन्य मुख्य आरोपी

आर्थिक अपराध शाखा (EOW) की जांच के अनुसार, इस घोटाले की साजिश केवल एक स्तर पर नहीं, बल्कि शासन, पशुपालन विभाग और परीक्षा कराने वाली निजी एजेंसी के गठजोड़ से रची गई थी। इस मामले में कुल 28 आरोपियों को नामजद किया गया है,

जिनमें से मुख्य नाम राजकिशोर सिंह (तत्कालीन पशुधन विकास मंत्री) घोटाले के समय कैबिनेट मंत्री थे। जांच में इनके खिलाफ भी पर्याप्त सबूत पाए गए हैं। शासन से अभियोजन स्वीकृति मिलते ही इन पर भी शिकंजा कसेगा। डॉ. चरण सिंह यादव (तत्कालीन निदेशक, पशुपालन विभाग) इन्होंने भर्ती प्रक्रिया के दौरान नियमों की अनदेखी की और अपात्रों की सूची को आगे बढ़ाया। इन्हें 2019 में ही निलंबित कर दिया गया था। डॉ. पी.के. सिंह (तत्कालीन अपर निदेशक/नोडल अधिकारी) भर्ती बोर्ड और परीक्षा के संचालन में मुख्य भूमिका में थे।निजी परीक्षा एजेंसी के संचालक लिखित परीक्षा की ओएमआर (OMR) शीट के मूल्यांकन और हेरफेर में मेसर्स वी.वी. इंटरप्राइजेज और मेसर्स डेटा सॉफ्ट जैसी निजी एजेंसियों के संचालकों को मुख्य आरोपी बनाया गया है, जिन्होंने कूटरचित (फर्जी) दस्तावेज तैयार किए। विभाग के अन्य अधिकारी व बिचौलिएतत्कालीन संयुक्त निदेशक, उपनिदेशक स्तर के अधिकारी और कई बिचौलिए शामिल हैं जिन्होंने मेरिट सूची बदलने के बदले रिश्वत का लेन-देन किया।

EOW की आगामी कानूनी प्रक्रिया

पूर्व प्रमुख सचिव योगेश कुमार की गिरफ्तारी के बाद, EOW अब मामले को कोर्ट में तार्किक अंत तक पहुंचाने के लिए EOW ने योगेश कुमार को लखनऊ की विशेष अदालत (Special EOW/Anti-Corruption Court) में पेश किया है। एजेंसी अदालत से उनकी कस्टडी रिमांड मांग सकती है ताकि घोटाले में पैसों के लेन-देन (Money Trail) और अन्य बड़े चेहरों की संलिप्तता के बारे में पूछताछ की जा सके।

1.     पूरक चार्जशीट दाखिल करना (Filing of Supplementary Charge Sheet) : EOW अब तक 28 में से 25 आरोपियों के खिलाफ कोर्ट में चार्जशीट (आरोप पत्र) दाखिल कर चुकी है। योगेश कुमार और बचे हुए अन्य आरोपियों के खिलाफ जांच पूरी कर EOW जल्द ही पूरक चार्जशीट (Supplementary Charge Sheet) अदालत में पेश करेगी।

2.     मंत्रियों और बड़े अधिकारियों पर अभियोजन स्वीकृति (Prosecution Sanction) : तत्कालीन मंत्री राजकिशोर सिंह और कुछ अन्य वरिष्ठ लोक सेवकों के खिलाफ अदालत में मुकदमा चलाने के लिए EOW को उत्तर प्रदेश शासन से औपचारिक मंजूरी (अभियोजन स्वीकृति) का इंतजार है। इसके लिए रिमाइंडर भेजे जा रहे हैं। मंजूरी मिलते ही इनके खिलाफ भी वारंट और कुर्की की कार्रवाई शुरू होगी।

3.     1005 अभ्यर्थियों की नियुक्तियों पर फैसला : चूंकि EOW ने यह साबित कर दिया है कि ओएमआर शीट और मेरिट लिस्ट में बड़े पैमाने पर जालसाजी हुई थी, इसलिए EOW अपनी अंतिम रिपोर्ट में इन अवैध नियुक्तियों को रद्द करने की सिफारिश कर सकती है। इसके बाद शासन इन सभी 1,005 कर्मियों की सेवा समाप्ति (Termination) पर अंतिम निर्णय लेगा।

इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश के मुख्य बिंदु (Key Points of HC Order)

यह भर्ती प्रक्रिया जून 2014 में ही संपन्न हो चुकी थी और आरोपी अधिकारी भी रिटायर हो चुके थे। लेकिन वर्ष 2017 में इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा दिए गए एक कड़े आदेश के बाद ही इस दब चुके मामले की परतें खुलीं:

पारदर्शिता का अभाव और गंभीर विसंगतियां: हाईकोर्ट ने असफल अभ्यर्थियों (विकाश व 34 अन्य) की याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए पाया कि प्रथम दृष्टया भर्ती प्रक्रिया में तय नियमों, सरकारी शासनादेशों और चयन मानकों की घोर अनदेखी की गई है।

विभागीय जांच पर अविश्वास : कोर्ट ने माना कि चूंकि घोटाले में विभाग के शीर्ष अधिकारी खुद शामिल प्रतीत हो रहे हैं, इसलिए पशुपालन विभाग की आंतरिक जांच पर भरोसा नहीं किया जा सकता।

SIT जांच का ऐतिहासिक निर्देश (17 दिसंबर 2017) : हाईकोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए उत्तर प्रदेश सरकार को आदेश दिया कि इस पूरी भर्ती की जांच विशेष जांच दल (SIT) को सौंपी जाए। कोर्ट ने समयबद्ध जांच करने और ओएमआर कॉपियों की फॉरेंसिक/तकनीकी जांच कराने के निर्देश दिए।

दायर हुई एफआईआर की बुनियाद : इसी अदालती आदेश के बाद SIT ने जांच शुरू की और 2018 में अपनी रिपोर्ट में घोटाले की पुष्टि की। इसी आदेश के प्रभाव से वर्ष 2019 में एसआईटी थाने में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम और धोखाधड़ी की गंभीर धाराओं के तहत मुकदमा (FIR No. 01/2019) दर्ज हो सका, जिसकी परिणति अब रिटायर्ड आईएएस की गिरफ्तारी के रूप में सामने आई है।

पशुधन प्रसार अधिकारी भर्ती घोटाले (2014) की जांच जिस गंभीरता से आगे बढ़ रही है, उसे देखते हुए आरोपियों की संपत्तियों की जब्ती, गैंगस्टर एक्ट (Gangster Act) और प्रवर्तन निदेशालय (ED) की जांच की प्रबल संभावनाएं बन रही हैं। उत्तर प्रदेश में संगठित भ्रष्टाचार के खिलाफ सरकार के कड़े रुख के मद्देनजर इस मामले में कानूनी रूप से निम्न रास्ते खुले हैं :- 

उत्तर प्रदेश गैंगस्टर एक्ट की संभावना (Possibility of Gangster Act)

संगठित गिरोह का गठन: जांच एजेंसी (EOW) ने पाया है कि इस घोटाले को अंजाम देने के लिए अधिकारियों, नेताओं और निजी एजेंसियों के संचालकों ने मिलकर एक संगठित आपराधिक सिंडिकेट (Organized Criminal Syndicate) की तरह काम किया।

संपत्ति कुर्क करने का अधिकार: यदि EOW इस मामले में आरोपियों को एक संगठित गिरोह (Gang) के रूप में प्रमाणित करती है, तो शासन की अनुमति से आरोपियों पर गैंगस्टर एक्ट की धारा 14(1) लगाई जा सकती है। इसके तहत जिला मजिस्ट्रेट (DM) को अपराधियों द्वारा अवैध रूप से कमाई गई चल-अचल संपत्तियों को कुर्क (Seize) करने का सीधा अधिकार मिल जाता है। उत्तर प्रदेश में हाल के वर्षों में कई भर्ती घोटालों और पेपर लीक के मास्टरमाइंड्स पर यह कार्रवाई की जा चुकी है।

प्रवर्तन निदेशालय (ED) की जांच और मनी लॉन्ड्रिंग (Possibility of ED & PMLA Case)

भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (Prevention of Corruption Act) की धारा 13 और आईपीसी की धारा 420 व 120B 'शेड्यूल्ड ऑफेंस' (अनुसूचित अपराध) की श्रेणी में आते हैं। चूंकि इस मामले में 1,005 पदों के चयन के बदले करोड़ों रुपये के अवैध लेन-देन (रिश्वत) की आशंका है, इसलिए EOW अपनी जांच रिपोर्ट और एफआईआर की कॉपी केंद्रीय एजेंसी ED के साथ साझा कर सकती है। यदि ED इस मामले को हाथ में लेती है, तो वह मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (PMLA) के तहत केस दर्ज कर आरोपियों, बिचौलियों और कंपनियों की संपत्तियों को अस्थायी रूप से ज़ब्त (Attach) कर सकती है।

वर्तमान स्थिति : पहली प्राथमिकता "चार्जशीट और पूछताछ" फिलहाल, आर्थिक अपराध शाखा (EOW) की पहली प्राथमिकता रिटायर्ड IAS योगेश कुमार की कस्टडी रिमांड लेकर उनसे पूछताछ करना और कोर्ट में पूरक चार्जशीट दाखिल करना है। एक बार जब इस घोटाले के माध्यम से कमाए गए "अवैध धन (Proceeds of Crime)" और संपत्तियों का पूरा ब्यौरा (Money Trail) कंक्रीट साक्ष्यों के साथ स्थापित हो जाएगा, तब अवैध संपत्तियों को कुर्क करने और ईडी/गैंगस्टर एक्ट लगाने की कानूनी प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जाएगा।

इस भर्ती घोटाले में लगाई गई भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की विशिष्ट धाराओं का विवरण नीचे दिया गया है:

भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (Anti-Corruption Act) की विशेष धाराएं

आर्थिक अपराध शाखा (EOW) और SIT ने आरोपियों के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 (Prevention of Corruption Act, 1988) की बेहद गंभीर धाराएं लगाई हैं:

धारा 13(1)(d) [आपराधिक कदाचार / Criminal Misconduct]: यह इस मामले की सबसे मुख्य धारा है। यह धारा तब लगाई जाती है जब कोई लोक सेवक (Public Servant) अपने पद का दुरुपयोग करके, अवैध तरीकों से या बिना किसी जनहित के, अपने लिए या किसी अन्य व्यक्ति के लिए कोई मूल्यवान वस्तु या आर्थिक लाभ प्राप्त करता है। रिटायर्ड IAS योगेश कुमार और तत्कालीन निदेशकों पर इसी धारा के तहत पद के दुरुपयोग का आरोप है।

धारा 13(2) [दंड का प्रावधान]: धारा 13(1)(d) के तहत किए गए अपराध के लिए सजा तय करती है। इसके तहत दोषी पाए जाने पर कम से कम 4 वर्ष और अधिकतम 10 वर्ष तक की कैद और जुर्माने का प्रावधान है।

IPC की संबद्ध धाराएं: इन धाराओं को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 409 (लोक सेवक द्वारा आपराधिक विश्वासघात), 420 (धोखाधड़ी), 467/468/471 (फर्जी दस्तावेज बनाना और उनका उपयोग करना) तथा 120B (आपराधिक साजिश) के साथ मिलाकर लागू किया गया है, जो इस मामले को गैर-जमानती और अत्यधिक गंभीर बनाता है।

अखिलेश यादव के नेतृत्व वाली समाजवादी पार्टी (सपा) सरकार पर मामले के उजागर होने से राजनीतिक गलियारों में बड़ा असर पड़ा

यह घोटाला वर्ष 2014 में अखिलेश यादव के नेतृत्व वाली समाजवादी पार्टी सरकार के कार्यकाल के दौरान हुआ था। इस मामले के उजागर होने से राजनीतिक गलियारों में बड़ा असर पड़ा:

"भर्ती में धांधली" के आरोपों को बल: इस घोटाले ने तत्कालीन सपा सरकार के दौरान सरकारी नौकरियों में होने वाली नियुक्तियों की पारदर्शिता पर बड़े सवाल खड़े किए। विपक्षी दलों (विशेषकर भाजपा) ने इसे चुनावी मुद्दा बनाया और आरोप लगाया कि सपा सरकार में नौकरियां योग्यता के बजाय "रिश्वत और राजनीतिक रसूख" के आधार पर बांटी जा रही थीं।

कैबिनेट मंत्री की संलिप्तता से किरकिरी: तत्कालीन पशुधन विकास मंत्री राजकिशोर सिंह का नाम इस घोटाले में मुख्य साजिशकर्ता के रूप में आने से पार्टी की छवि को गहरा धक्का लगा। राजकिशोर सिंह उस समय सरकार के कद्दावर मंत्रियों में गिने जाते थे। उनके खिलाफ जांच शुरू होने से सरकार बैकफुट पर आ गई थी।

सत्ता परिवर्तन और जीरो टॉलरेंस नीति: वर्ष 2017 में जब उत्तर प्रदेश में भाजपा की सरकार आई, तो मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पूर्ववर्ती सरकार के कार्यकाल में हुई कई भर्तियों (जैसे UPPSC, अधीनस्थ सेवा चयन आयोग और यह पशुधन भर्ती) की जांच SIT और EOW को सौंप दी। हाल ही में हुई रिटायर्ड IAS अधिकारी की गिरफ्तारी को वर्तमान सरकार अपनी "भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस" नीति के एक बड़े उदाहरण के रूप में पेश कर रही है, जिससे सपा को रक्षात्मक रुख अपनाना पड़ रहा है।   

समाजवादी पार्टी (सपा) पर इसके गंभीर और विपरीत राजनीतिक असर

यह घोटाला अखिलेश यादव के मुख्यमंत्री कार्यकाल (2012-2017) के दौरान हुआ था। उनके शासनकाल के इतने शीर्ष अधिकारी (प्रमुख सचिव) की गिरफ्तारी से मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की पार्टी (भाजपा) को जनता के बीच यह नैरेटिव ले जाने में सीधा रास्ता मिल गया है कि सपा सरकार की पूरी कार्यशैली ही भ्रष्टाचार से प्रेरित थी। सत्ता पक्ष अब जनता के सामने यह बात आक्रामक तरीके से रख रहा है कि अखिलेश यादव के नेतृत्व में सरकारी नौकरियां पारदर्शी तरीके से नहीं, बल्कि प्रशासनिक मिलीभगत और रिश्वत के दम पर बांटी जा रही थीं। पशुधन प्रसार अधिकारी भर्ती घोटाले में पूर्व प्रमुख सचिव योगेश कुमार की गिरफ्तारी के बाद, आज की तारीख में समाजवादी पार्टी (सपा) पर इसके गंभीर और विपरीत राजनीतिक असर पड़ सकते हैं: "भर्ती में भ्रष्टाचार" के पुराने नैरेटिव का दोबारा जीवित होना I मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के कार्यकाल (2012-2017) के दौरान विपक्ष द्वारा लगाए गए "नौकरियों में भाई-भतीजावाद और भ्रष्टाचार" के आरोपों को इस गिरफ्तारी से नया बल मिला है। आज की तारीख में भाजपा इस कार्रवाई का हवाला देकर जनता के बीच यह संदेश मजबूत करने की कोशिश करेगी कि सपा शासनकाल में योग्य युवाओं के हक पर डाका डाला गया था।

योगी आदित्यनाथ की पार्टी (भाजपा) का 2027 के विधानसभा चुनावों से पहले बड़ी राजनीतिक घेराबंदी का आक्रामक प्रयास

उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनावों की तैयारियां शुरू हो चुकी हैं। ऐसे समय में इस हाई-प्रोफाइल प्रशासनिक गिरफ्तारी ने पूर्ववर्ती सपा सरकार के "कथित कुशासन" के पुराने मुद्दों को दोबारा राजनीतिक चर्चा के केंद्र में ला दिया है। वर्तमान सत्ता पक्ष इस कार्रवाई को अपनी भ्रष्टाचार विरोधी नीतियों की मिसाल बनाकर पेश कर रहा है, जिससे चुनाव से पहले सपा की राजनीतिक घेराबंदी काफी कड़ी हो गई है। योगी आदित्यनाथ और उनकी पार्टी इस मामले को एक बड़े हथियार के रूप में इस्तेमाल कर रही है। भाजपा संगठन और उसके प्रवक्ता जनता के बीच जाकर यह विपरीत नैरेटिव बनाने का पुरजोर प्रयास कर रहे हैं कि अखिलेश सरकार में ओएमआर शीट बदलकर योग्य और गरीब अभ्यर्थियों के हक पर डाका डाला गया।इतने बड़े स्तर पर जालसाजी बिना शीर्ष राजनीतिक संरक्षण (मुख्यमंत्री कार्यालय या कैबिनेट मंत्री) के संभव नहीं थी। भाजपा अपनी सरकार की "भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस" नीति की तुलना सपा के कथित "भ्रष्टाचार मॉडल" से करके खुद को साफ-सुथरी छवि वाली सरकार साबित करने में जुटी है।

2027 के विधानसभा चुनावों से पहले अखिलेश यादव की छवि और पार्टी को धक्का

2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव नजदीक हैं, और अखिलेश यादव इस समय युवाओं, बेरोजगारी और पेपर लीक के मुद्दों पर वर्तमान सरकार को लगातार घेर रहे हैं। यह कार्रवाई 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से ठीक पहले हुई है, जिससे इसका राजनीतिक महत्व बहुत बढ़ गया है। चुनाव की तैयारियों में जुटी समाजवादी पार्टी के लिए युवाओं और बेरोजगारों के मुद्दों पर वर्तमान सरकार को घेरना थोड़ा चुनौतीपूर्ण हो सकता है, क्योंकि सत्ता पक्ष जवाबी हमले में 2014 के इस बड़े घोटाले के सबूत सामने रख देगा।  ऐसे समय में इस पुराने घोटाले के पुख्ता सबूत और गिरफ्तारी सामने आने से अखिलेश यादव की व्यक्तिगत छवि और समाजवादी पार्टी की साख को गहरा धक्का लगा है। अब जब भी सपा रोजगार या सरकारी भर्तियों में पारदर्शिता की बात करेगी, भाजपा पलटवार में 2014 के इस घोटाले का उदाहरण सामने रख देगी, जिससे सपा को रक्षात्मक (Defensive) रुख अपनाने पर मजबूर होना पड़ रहा है।

सपा का संभावित बचाव और राजनीतिक काउंटर-अटैक

विपरीत राजनीतिक प्रभावों के बीच, समाजवादी पार्टी इस मामले में अपनी रणनीति इस तरह रख सकती है I सपा यह तर्क दे सकती है कि वर्तमान सरकार अपनी विफलताओं और हालिया बेरोजगारी के मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए 12 साल पुराने मामलों को चुनावी लाभ के लिए तूल दे रही है। घोटाले के मुख्य आरोपी और तत्कालीन पशुधन मंत्री राजकिशोर सिंह बाद में भाजपा में शामिल हो गए थे। सपा इस बिंदु को ढाल बनाकर भाजपा पर पलटवार कर सकती है कि भ्रष्टाचार का आरोप झेलने वाले नेता को भाजपा ने अपनी पार्टी में क्यों शरण दी। कुल मिलाकर, आज की तारीख में यह घोटाला समाजवादी पार्टी की पुरानी कमियों को सार्वजनिक विमर्श में लाकर उसकी राजनीतिक घेराबंदी को कड़ा करने का काम कर रहा है।

 

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