कोर्ट तक पहुंचा मामला
टेंडर से कहीं अधिक मात्रा और मूल्य का ऑर्डर जारी होने का यह मामला तूल पकड़ते हुए कानूनी पेंच में फंस गया और अदालत (कोर्ट) तक पहुंच गया। कारपोरेशन को इस वजह से कानूनी और अदालती कार्यवाही का सामना करना पड़ रहा है। मामले में जब अधिकारियों की भूमिका और लापरवाही पर गंभीर सवाल उठे, तो कानूनी कार्रवाई से बचने और कारपोरेशन की साख बचाने के लिए शासन के निर्देश पर जीएम सुगंधा शर्मा पर निलंबन या स्पष्टीकरण के बजाय सीधे बर्खास्तगी की बड़ी गाज गिरी।
ED और विजिलेंस की बड़ी जांच का हिस्सा
उत्तर प्रदेश मेडिकल सप्लाई कारपोरेशन (जिसका गठन ही स्वास्थ्य विभाग में भ्रष्टाचार रोकने और पारदर्शी तरीके से दवा-उपकरणों की खरीद के लिए किया गया था) फिलहाल कई बड़ी केंद्रीय और राज्य स्तरीय जांच एजेंसियों के रडार पर है I प्रवर्तन निदेशालय (ED) और विजिलेंस की टीमें कारपोरेशन में पिछले कई वर्षों के दौरान हुए दवा और मेडिकल उपकरणों की आपूर्ति में ₹100 करोड़ के एक अन्य बड़े कथित घोटाले की जांच कर रही हैं। ED ने कारपोरेशन से पिछले 7 वर्षों (2019-20 से 2025-26) के टेंडर, आपूर्ति, भुगतान और बैंक गारंटी से जुड़े सभी दस्तावेज़ 'अति आवश्यक' श्रेणी में मांगे हैं।
इस मामले में पूर्व विधायक मुकेश श्रीवास्तव समेत कई कंपनियों के खिलाफ एफआईआर (FIR) दर्ज हो चुकी है। इससे पहले नेशनल हेल्थ मिशन (NHM) से जुड़े कुछ अधिकारियों पर भी मिलीभगत कर निजी कंपनियों को अवैध लाभ पहुंचाने के आरोप में कार्रवाई की जा चुकी है। 15 लाख के टेंडर को 15 करोड़ में बदलने की इस ताज़ा गड़बड़ी ने यूपी के स्वास्थ्य महकमे और सप्लाई चेन प्रबंधन में बड़े भ्रष्टाचार और अफसरों की मनमानी को एक बार फिर उजागर कर दिया है।