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भारत का स्पष्ट और कड़ा संदेश "खून और पानी एक साथ नहीं बह सकते, पाकिस्तान की मांग पर गठित यह ट्रिब्यूनल "पूरी तरह से अवैध"

✍ Mamta Singh 📅 1 सितंबर 2026 👁 67 बार पढ़ा गया
भारत का स्पष्ट और कड़ा संदेश "खून और पानी एक साथ नहीं बह सकते,  पाकिस्तान की मांग पर गठित यह ट्रिब्यूनल "पूरी तरह से अवैध"

1960 की सिंधु जल संधि (Indus Waters Treaty - IWT) पर भारत का रुख वर्तमान समय में अपने सबसे कड़े और ऐतिहासिक रूप में है। अप्रैल 2025 में जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए बड़े आतंकवादी हमले के बाद, भारत ने इस संधि को 'स्थगित' (Abeyance) रखने का कड़ा कदम उठाया। नई दिल्ली का स्पष्ट और कड़ा संदेश है कि "खून और पानी एक साथ नहीं बह सकते"।

भारत ने दशकों पुरानी अपनी 'उदारतावादी' नीति को बदलते हुए अब पानी को सीधे राष्ट्रीय सुरक्षा से जोड़ दिया है। भारत का स्पष्ट स्टैंड है कि एक तरफ पाकिस्तान सीमा पार से आतंकवाद को प्रायोजित कर रहा है और दूसरी तरफ भारत से बिना किसी बाधा के पानी की उम्मीद रखता है, यह अब संभव नहीं है। संधि को स्थगित रखकर भारत ने पाकिस्तान पर एक बड़ा रणनीतिक दबाव बना दिया है。

हाल ही में (अगस्त 2026 में), भारत ने हेग स्थित 'कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन' (CoA) के फैसलों को पूरी तरह से खारिज कर दिया है। भारत का मानना है कि पाकिस्तान की मांग पर गठित यह ट्रिब्यूनल "पूरी तरह से अवैध" है।  भारत ने साफ कर दिया है कि वह इस एकतरफा अदालती प्रक्रिया को मान्यता नहीं देता और इस निकाय के किसी भी फैसले का भारत की जलविद्युत परियोजनाओं पर कोई असर नहीं पड़ेगा।

सिंधु जल संधि के तहत नदी प्रणाली का लगभग 80% पानी पाकिस्तान को और केवल 20% भारत को मिलता है। भारत इस बंटवारे को अब असमान और पुराना मानता है। भारत का रुख है कि बदलती जनसांख्यिकी, जलवायु परिवर्तन (Climate Change) और जम्मू-कश्मीर के किसानों की जरूरतों को देखते हुए इस संधि में व्यापक संशोधन (Renegotiation) होना चाहिए।

संधि को स्थगित करने के साथ ही, भारत ने पश्चिमी नदियों (चिनाब, झेलम, सिंधु) पर अपनी रुकी हुई या धीमी परियोजनाओं को तेज कर दिया है। इनमें शामिल हैं, साउद बांध, कीरू बांध, रतले और पकल दुल जैसी परियोजनाओं पर काम तेज किया गया है। हिमाचल प्रदेश में चीन-ब्यास टनल जैसी परियोजनाओं के जरिए अतिरिक्त पानी को कृषि और नागरिक उपयोग के लिए मोड़ने की रणनीतियों पर काम हो रहा है। भारत अब पश्चिमी नदियों के पानी का वह सारा 'गैर-उपभोक्ता उपयोग' (Non-consumptive use) कर रहा है, जिसकी अनुमति उसे संधि के तहत पहले से थी लेकिन पाकिस्तान के विरोध के कारण वह नहीं कर पा रहा था।

भारत सरकार के सूत्रों के अनुसार, यह संधि अब अपने पुराने स्वरूप में कभी बहाल नहीं होगी। यदि भविष्य में कोई बातचीत होती भी है, तो वह केवल नई शर्तों और एक नए ढांचे के तहत ही संभव होगी। इसके लिए पाकिस्तान को पहले आतंकवाद के खिलाफ अपरिवर्तनीय और पुख्ता कदम उठाने होंगे।

भारत का यह रुख कूटनीतिक रूप से बेहद प्रभावी साबित हो रहा है। पाकिस्तान की कृषि, बिजली और अर्थव्यवस्था पूरी तरह से इसी सिंधु बेसिन पर टिकी है। भारत की इस कड़ाई से परेशान होकर पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय मंचों (जैसे अमेरिका और संयुक्त राष्ट्र) पर गुहार लगा रहा है, लेकिन भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि यह दोनों देशों का द्विपक्षीय मामला है और आतंकवाद के खात्मे के बिना जल-सहयोग की बहाली नामुमकिन है।

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